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क्या है आर्गेनिक फार्मिंग | What is Organic Farming

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आप सभी का Organic School House हिंदी ब्लॉग पर स्वागत है। आज के इस आर्टिकल में हम आपको जैविक खेती यानी ऑर्गेनिक फार्मिंग के बारे में पूरी जानकारी देने का प्रयास करेंगे। यह एक ऐसा टॉपिक है जिस पर बहुत से लोग जानकारी लेना चाहते हैं जैसे कि Organic Farming क्या है और ऑर्गेनिक फार्मिंग कैसे करें, जैविक खेती क्या है इत्यादि।

इसमें लोगों के बहुत से सवाल होते है जैसे कार्बनिक खेती क्या है, जैविक खेती पर निबंध, जैविक खेती किसे कहते हैं, ऑर्गेनिक खेती की जानकारी या भारत में जैविक खेती या Organic Farming in India. इन सभी की जानकारी आपको यहाँ मिलेगी।

भारत एक कृषि प्रधान देश है तथा कृषि देश की अर्थव्यवस्था का प्रमुख साधन है। भोजन मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता है और उनसे ही जीवन है।

क्या है जैविक खेती ?

ऑर्गेनिक फार्मिंग यानी जैविक खेती : Organic Farming का मतलब है कि हम बिना किसी रसायन या पेस्टिसाइड्स के जो खेती करते हैं वह Organic Farming होती है। प्राकृतिक सोर्स द्वारा जो मिट्टी में खनिज होते हैं उनके द्वारा उत्पन्न तत्वों को ही प्रयोग में लाया जाता है।

आर्गेनिक फार्मिंग मतलब जैविक खेती 

ऑर्गेनिक फार्मिंग का उद्देश्य मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनाए रखने के साथ-साथ फसलों के पोषक तत्वों को भी बनाए रखना है।

ऑर्गेनिक फार्मिंग में बिना कोई दवाई, खाद, पेस्टिसाइड्स का इस्तेमाल किए बिना जो प्रोडक्ट या खाद्य पदार्थों में मिलता है वह ऑर्गेनिक होता है। जैविक खेती में रसायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों तथा खरपतवार नाशक के स्थान पर जीवांश खाद पोषक तत्वों जैसे गोबर की खाद कंपोस्ट, हरी खाद, जीवाणु कल्चर, जैविक खाद आदि का प्रयोग किया जाता है।

आजकल किसान भाई ज्यादा से ज्यादा पैदावार के लिए फसलों में उर्वरक खाद, कीटनाशक या पेस्टिसाइड्स का बहुत इस्तेमाल करते हैं जिससे उनकी पैदावार में तो इजाफा हुआ लेकिन हमारी मिट्टी की उर्वरक क्षमता कमजोर होती चली गई।

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अपनी फसलों के उत्पादन के लिए किसान रासायनिक खाद जहरीले कीट नाशक पदार्थों का उपयोग करने लगे हैं जो कि इंसानों के स्वास्थ्य और मिट्टी के स्वास्थ्य दोनों के लिए हानिकारक है इसी के साथ साथ हमारा वातावरण भी प्रदूषित होता जा रहा है।

इन सभी चीजों को रोकने के लिए सभी किसान रसायनिक तरीकों की जगह ऑर्गेनिक फार्मिंग का प्रयोग करें तो इन सभी समस्याओं पर काफी हद तक काबू किया जा सकता है, आजकल किसान सभी रासायनिक तत्व पर निर्भर होते चले गए और अब तमाम फसलें बिना रसायनिक तत्वों के उत्पन्न भी नहीं होती हैं हमारी मिट्टी की घटती उर्वरक क्षमता एक चिंता का विषय बन गया है।

इसलिए आजकल हमारे वैज्ञानिकों और कुछ किसानों ने जैविक खेती यानी ऑर्गेनिक फार्मिंग की तरफ कदम बढ़ाया है और यह काफी हद तक सफल होता दिख रहा है एक तरफ तो हमें ऑर्गेनिक फार्मिंग से शुद्ध फसल मिलती है और दूसरा इसे हमारी मिट्टी की उर्वरक क्षमता भी बरकरार रहती है 

परंपरागत खेती और ऑर्गेनिक खेती:

परंपरागत खेती में बीज बोने से पहले और फसल काटने तक किसान के सामने कई ऐसे मौके आते हैं जिसमें वह खूब रसायनिक तत्वों और कीटनाशकों का प्रयोग करता है 

जैविक खेती यानी ऑर्गेनिक फार्मिंग में किसान पहले खेत तैयार करने से पहले मिट्टी को शोधित करता है और अगर उस में खरपतवार की शिकायत आती है तो वह परंपरागत खेती के मुकाबले जैविक खेती में उनको हाथों से निकालता है इसमें कीटनाशकों का प्रयोग नहीं किया जाता।

जैविक खेती यानि ऑर्गेनिक फार्मिंग में बहुत मेहनत का काम होता हैलेकिन इससे न मनुष्य, न हमारी मिट्टी और ना ही पर्यावरण को नुकसान होता है यह सभी सुरक्षित रहते हैं सिर्फ जैविक खेती के द्वारा।  

ऑर्गेनिक फार्मिंग यानी जैविक खेती करने के मुख्य कारण:

  1. मिट्टी के स्वास्थ्य को बचाने के लिए: 

जब रसायनिक खाद और कीटनाशक नहीं बने थे तब किसान गोबर सहित तमाम तरह के कूड़े कचरे के कंपोस्ट से बने खाद का इस्तेमाल करते थे जिससे मिट्टी की उर्वरता में इजाफा होता था और फसल अच्छी होती थी.  लेकिन समय के साथ साथ आधुनिकता आने के कारण बाजारों में रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक आ गए और किसान इन का इस्तेमाल करने लगे जिससे किसानों की फसल में इजाफा होने लगा. लेकिन इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे जिससे मिट्टी की उर्वरक ता घटने लगी और यह एक बहुत बुरा संकेत था

  1. फसल या खाद्य पदार्थों के पोषक तत्वों को बचाए रखने के लिए:

आज की आधुनिकता के कारण जैसे-जैसे रसायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की मात्रा बढ़ती गई वैसे ही उगने वाले खाद्य पदार्थों और सब्जियों की पोषक तामें कमी होती गई।

आज के दिनों की हालत यह हो गई की सब्जियां समेत खाद्य पदार्थ और अनाज ऐसे हो गए जिसमें पोषक तत्वों के मुकाबले हानिकारक तत्व ज्यादा हो गए।

रसायनिक उर्वरकों और पेस्टिसाइड के इस्तेमाल से उत्पन्न होने वाली फसलों के प्रयोग से तरह-तरह की बीमारियां फैल रही है इनका इलाज करवाना आम आदमी के लिए मुश्किल हो जाता है।

 तो हम परंपरागत खेती ना करके जैविक खेती के द्वारा खाद्य पदार्थ सब्जियां अनाज उगाते हैं तो उनके पोषक तत्वों को बचा सकते हैं और भविष्य में आने वाली बीमारियों से बच सकते हैं।

  1. कृषि की लागत कम करने के लिए:

 अगर हम परंपरागत खेती करते हैं तो इसमें अलग-अलग तरह के रसायनिक तत्वों और कीटनाशकों का प्रयोग करते हैं जिससे किसानों को फसल तैयार करने में काफी पैसा खर्च करना पड़ता है अगर जैविक खेती यानी ऑर्गेनिक फार्मिंग  की जाए तो रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर खर्च होने वाले पैसे को बचा सकते हैं।

  1. पशुओं के उत्पादों में खतरनाक तत्वों को रोकने के लिए:

जब किसान फसल उगाता है तो उसका एक हिस्सा पशुओं के चारे के रूप में भी प्रयोग किया जाता है जब पशु उस चारे को खाएंगे तो उनके अंदर कई किस्म के खतरनाक तत्व जन्म ले लेते हैं।

फिर उन्हीं पशुओं से प्राप्त दूध और अंडे आदि को मनुष्य खाते हैं  दूध अंडों की सेवन यह तो आदमी के शरीर में चले जाते हैं जो अनेक बीमारियों का कारण बनते है।

  1. पर्यावरण की रक्षा के लिए:

किसानों द्वारा तमाम तरह के नाशक दवाओं और रसायनिक उर्वरकों के छिड़काव से हमारा पर्यावरण बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है एक रिपोर्ट के मुताबिक जब किसान दवाओं का छिड़काव करते हैं तो 90% से ज्यादा बाग हवा में मिल जाते हैं और 10% प्रतिशत से कम भाग सिर्फ फसल पर लगता है।

  1.  प्राकृतिक और अच्छा स्वाद:

 जो लोग ऑर्गेनिक फार्मिंग से उत्पन्न होने वाले खदान और सब्जियों से बने भोजन को खा लेते हैं वह उसके स्वाद को चाह कर भी नहीं बोल पाते क्योंकि ऑर्गेनिक फार्मिंग से प्राप्त फलों और सब्जियों का स्वाद उच्च स्तर का होता है.

ऑर्गेनिक फार्मिंग करने वाले किसान मात्रा की बजाय गुणवत्ता पर ध्यान देते हैं।  ऑर्गेनिक फार्मिंग के मुख्य फायदे अच्छा पोषण, अच्छा स्वास्थ्य, जहर से मुक्ति, कम लागत, बढ़िया स्वाद, और पर्यावरण की सुरक्षा आदि है।

  •   पारंपरिक खेती से होने वाले नुकसान:
  • मिट्टी की उर्वरता कम होती है
  •  बारिश के मौसम में नाइट्रेट पानी के साथ बैठकर पानी के स्रोतों को दूषित कर देता हैl
  •  ज्यादा  इंधन और ज्यादा जुताई की आवश्यकता पड़ती है जिससे पैसों का खर्च बढ़ता हैl
  •  मनुष्य और जानवरों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है

ऑर्गेनिक फार्मिंग करते समय आने वाली समस्याएं:

 जब ऑर्गेनिक फार्मिंग के इतने फायदे हैं तो सभी लोग ऐसा क्यों नहीं कर पा रहे हैं इसके बारे में हम यहां चर्चा  करेंगे:

  •  भारत में किसानों को बड़ी मात्रा में ऑर्गेनिक फार्मिंग की जानकारी नहीं है और सरकार भी किसानों को इससे अवगत कराने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा रही है ऐसे में यह जरूरी है कि हम अपने माध्यम से किसान तस्वीर मुख्य जानकारी को पहुंचाएं।
  •  जैविक खेती जाने ऑर्गेनिक फार्मिंग करने के लिए बहुत ही साधना और उपकरणों की जरूरत होती है जो हमारे देश में अभी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में सरकार को कोशिश करनी चाहिए कि वह ऑर्गेनिक फार्मिंग करने वाले किसानों को वित्तीय सहायता करें ऐसा करने से ज्यादा से ज्यादा लोग ऑर्गेनिक फार्मिंग की तरफ  बढ़ेंगे

 जैविक खेती के तरीके: 

फसल विविधता यानी Crop Diversity:  जैविक खेती में फसल विविधता यानी ग्रुप डाइवर्सिटी को प्रोत्साहित किया जाता है इसके अनुसार एक जगह पर कई फसलों का उत्पादन किया जाता है यानी हम एक जगह पर तीन-चार फसलों को उगा सकते हैं।

मृदा प्रबंधन Soil Management:  मृदा प्रबंधन यानी सोई मैनेजमेंट भूमि प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है इसके प्रयोग से हम भूमि की गुणवत्ता को बढ़ा सकते हैं इसे करने के लिए हमें मिट्टी के प्रकार और मिट्टी की विशेषताओं पर ध्यान देना आवश्यक है।

खरपतवार प्रबंधन यानी Weed management: खरपतवार मतलब अनावश्यक वनस्पति जो की फसलों या पौधों के मध्य में अपने आप उठ जाते हैं और फसलों को मिलने वाले पोषण का स्वयं उपयोग करते हैं जिसका निपटारा भी जैविक खेती में किया जाता है।

ऐसा करने से ऑर्गेनिक फार्मिंग के प्रयोग में उत्पादन भी बढ़ता है और साथ ही साथ वातावरण को भी हानि नहीं पहुंचती और खाने के लिए केमिकल मुक्त भोजन भी प्राप्त होता है जिससे स्वास्थ्य को हानि नहीं होती और हमारा स्वास्थ्य अच्छा रहता है। आज के समय में हमारे पास कई ऐसे उदाहरण है जिसने फसलों के उत्पादन को पहले से कई गुना बढ़ा दिया यही कारण है कि पढ़े-लिखे युवक भी नौकरी छोड़कर आजकल ऑर्गेनिक फार्मिंग की ओर रुख कर रहे हैं और कई गुना लाभ कमा रहे हैं।

भारतवर्ष में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है और कृषकों की मुख्य आय का साधन खेती है। हरित क्रांति के समय से बढ़ती हुई जनसंख्या को देखते हुए माय की दृष्टि से उत्पादन बढ़ाना आवश्यक है अधिक उत्पादन के लिए खेती में अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग करना पड़ता है जिससे सामान्य व छोटे कृषक के पास कम जोत में अधिक लागत लग रही है और जल भूमि वायु और वातावरण भी प्रदूषित हो रहा है साथ ही खाद्य पदार्थ भी जहरीले हो रहे हैं।

इसलिए इस प्रकार की उपरोक्त सभी समस्याओं से निपटने के लिए गत वर्षों से निरंतर टिकाऊ खेती के सिद्धांत पर खेती करने की सिफारिश की गई जो ऑर्गेनिक फार्मिंग कहलाता है जिसे प्रदेश की कृषि विभाग ने इस विशेष प्रकार की खेती को अपनाने के लिए बढ़ावा दिया और आजकल सरकार भी कुछ तरीकों के माध्यम से जैविक खेती यानी ऑर्गेनिक फार्मिंग के प्रचार प्रसार कर रही है।

मध्यप्रदेश में सर्वप्रथम 2001-2002 में जैविक खेती का आंदोलन चलाकर प्रत्येक जिले के प्रत्येक विकासखंड के एक गांव में ऑर्गेनिक फार्मिंग शुरू की गई और इन गांव को जैविक गांव का नाम दिया गया इस प्रकार प्रथम वर्ष में कुल 313 गांव में जैविक खेती यानी ऑर्गेनिक फार्मिंग की शुरुआत हुई।

इसके बाद धीरे-धीरे यह बढ़ती गई और साल 2006 दो हजार सात में प्रत्येक विकासखंड में 55 गांव चिन्हित किए गए इस प्रकार प्रदेश के 3130 गांव में जैविक खेती का कार्यक्रम किया जा रहा है।

ऑर्गेनिक फार्मिंग के मुख्य घटक:

जैविक खाद: जैविक खाद में मुख्यतः खेती के अवशेष पशुओं के मल मूत्र का प्रयोग किया जाता है जिन को गलाने, सड़ने से कार्बनिक पदार्थ पैदा होते हैं जिनको जैविक खाद का जाता है।

हमारे देश में काफी समय से जैविक खादों का प्रयोग खेती में होता आया है. इसमें प्रमुख कंपोस्ट खाद है जो शहरों में कूड़े करकट दूसरी खेती के अवशेष और गोबर से तैयार की जाती है। गोबर की खाद में अन्य कंपोस्ट की अपेक्षा नाइट्रोजन और फास्फोरस अत्यधिक मात्रा में होते हैं। जैविक खादों में लगभग सभी आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा पाई जाती है।

गोबर की खाद:  भारत में अधिकतर किसान खेती के साथ-साथ पशुओं को भी पालते हैं। यदि किसान पशुओं के गोबर का प्रयोग खाद बनाने के लिए करें तो स्वयं ही अच्छी गुणवत्ता का खाद तैयार कर सकते हैं। अपने गांव में देखा होगा कि किसान एक जगह गोबर को इकट्ठा करते हैं और समय आने पर उसे खेत में डालते हैं जो खाद का काम करता है।

वर्मी कंपोस्ट यानी केंचुआ खाद:  इस प्रक्रिया में केंचुआ द्वारा गोबर और अन्य अवशेष को कम समय में उच्च गुणवत्ता की जैविक खाद में बदला जाता है।   इस प्रकार की खाद से मिट्टी के जल धारण क्षमता में अधिक वृद्धि होती है। यह खेत की मिट्टी में उर्वरक शक्ति को बढ़ाने और दीमक के प्रकोप को कम करता है तथा पौधों को संतुलित मात्रा में आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है।

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